जैसलमेर, राजस्थान.

रामदेवरा

थार के रेगिस्तान में बसा बाबा रामदेवजी का पवित्र धाम — जहाँ आस्था जाति और मज़हब की सीमाओं से परे है।

परिचय

एक गाँव, एक तीर्थ, एक अटूट आस्था

राजस्थान के जैसलमेर जिले की सुनहरी रेत के बीच बसा रामदेवरा राज्य के सबसे प्रमुख तीर्थ स्थलों में से एक है। यह छोटा-सा गाँव लोक संत बाबा रामदेवजी की समाधि स्थल होने के कारण करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र है।

रुणिचा धाम के नाम से भी जाना जाने वाला रामदेवरा, हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदायों की श्रद्धा का प्रतीक है और 600 वर्षों से भी अधिक समय से आस्था, भक्ति और सामाजिक सद्भाव की मिसाल बना हुआ है। पोकरण से मात्र 12 किलोमीटर उत्तर में स्थित यह स्थान जोधपुर-जैसलमेर रेल व सड़क मार्ग पर होने से हर श्रद्धालु के लिए सुगम है।

600+ वर्ष
पुरानी आस्था और परंपरा
12 किमी
पोकरण से उत्तर दिशा में दूरी
लाखों
श्रद्धालु हर वर्ष मेले में शामिल
कथा

बाबा रामदेवजी की जीवन गाथा

तंवर राजपूत कुल में जन्मे बाबा रामदेवजी एक संत, समाज सुधारक और चमत्कारी पुरुष के रूप में पूजनीय हैं। उनकी कथा समय के साथ यूँ आगे बढ़ी:

14वीं शताब्दी
पोकरण के तोमर वंशीय शासक अजमल सिंह तंवर के घर बाबा रामदेवजी का जन्म हुआ।
जीवन-काल
उन्होंने दलितों, महिलाओं और वंचित वर्गों के उत्थान के लिए कार्य किया — उस युग में जब यह सामाजिक सुधार दुर्लभ था।
15वीं शताब्दी
बाबा रामदेवजी ने रामदेवरा में सचेत अवस्था में समाधि ली। हिंदू उन्हें श्रीकृष्ण का अवतार मानते हैं, मुस्लिम समुदाय उन्हें रामसा पीर के रूप में पूजता है।
1931 ई.
बीकानेर के महाराजा गंगा सिंह ने समाधि स्थल के चारों ओर भव्य मंदिर का निर्माण करवाया।
आज
रामदेवरा हिंदू-मुस्लिम एकता के प्रतीक के रूप में और राजस्थान के प्रमुख धार्मिक पर्यटन केंद्र के रूप में जाना जाता है।
मंदिर परिसर

मंदिर और आसपास के प्रमुख स्थल

बारीक नक्काशीदार संगमरमर और बलुआ पत्थर से सजा यह मंदिर परिसर केवल पूजा-स्थल ही नहीं, बल्कि एक जीवंत सांस्कृतिक केंद्र भी है, जहाँ वर्षभर भजन और लोकगीत गूंजते रहते हैं।

राम सरोवर
मंदिर के ठीक बगल स्थित यह पवित्र सरोवर मान्यता अनुसार स्वयं बाबा रामदेवजी द्वारा बनवाया गया था। श्रद्धालु दर्शन से पहले यहाँ पवित्र स्नान करते हैं।
परचा बावड़ी
मंदिर से लगभग 100 मीटर उत्तर-पूर्व स्थित यह ऐतिहासिक बावड़ी बाबा रामदेवजी के चमत्कारों (परचों) से जुड़ी हुई है।
झूला-पालना
मंदिर परिसर में स्थित पारंपरिक झूला-पालना संरचना, जो स्थानीय भक्ति परंपराओं से गहराई से जुड़ी है।
वार्षिक उत्सव

रामदेवरा मेला — भादवा मेला

हर वर्ष भाद्रपद (अगस्त-सितंबर) में, भादो सुदी द्वितीया से एकादशी तक, लाखों श्रद्धालु पैदल यात्रा करते हुए बाबा के दरबार पहुँचते हैं। यह उत्तर भारत के सबसे बड़े लोक धार्मिक आयोजनों में से एक है।

यात्रा जानकारी

कब और कैसे जाएं

कैसे पहुँचें

  • हवाई मार्ग: निकटतम एयरपोर्ट जैसलमेर एयरपोर्ट है।
  • रेल मार्ग: रामदेवरा का अपना स्टेशन जोधपुर-जैसलमेर लाइन पर है; मेले के दौरान विशेष ट्रेनें भी चलती हैं।
  • सड़क मार्ग: जैसलमेर, पोकरण और जोधपुर से नियमित बस व टैक्सी सेवा उपलब्ध है।

यात्रा के सुझाव

  • पानी और आरामदायक जूते साथ रखें, खासकर मेले के दौरान।
  • मेले के मौसम में ठहरने की व्यवस्था पहले से बुक करें।
  • स्थानीय परंपराओं और शालीनता का सम्मान करें।
  • मंदिर में शालीन वस्त्र पहनें — कंधे व घुटने ढके रहें।

कैसे पहुँचें

  • मेले के लिए: अगस्त–सितंबर, पूरे उत्सव के माहौल के लिए।
  • शांत दर्शन के लिए: अक्टूबर–मार्च, सुहावने मौसम और कम भीड़ के लिए।
जिज्ञासा

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)

रामदेवरा, बाबा रामदेवजी की समाधि स्थल होने के लिए प्रसिद्ध है — एक 14वीं शताब्दी के लोक संत जिन्हें हिंदू और मुस्लिम दोनों समुदाय पूजते हैं — और वार्षिक रामदेवरा मेले के लिए भी जाना जाता है।

रामदेवरा राजस्थान के जैसलमेर जिले में पोकरण से लगभग 12 किलोमीटर उत्तर में स्थित एक गाँव है। जिसे रूणिचा के नाम से भी जाना जाता हैं। 

रामदेवरा मेले का आधिकारिक आयोजन प्रतिवर्ष भाद्रपद सुदी द्वितीया से भाद्रपद सुदी एकादशी (अगस्त–सितंबर) तक किया जाता है। हालाँकि, श्रद्धालुओं की गहरी आस्था के कारण, जमीनी स्तर पर इस उत्सव की शुरुआत श्रावण मास की शुक्ल पक्ष से ही हो जाती है। इस प्रकार, अनौपचारिक रूप से यह विशाल मेला लगभग 45 दिनों तक अनवरत चलता है।
 

बाबा रामदेवजी पोकरण में जन्मे एक तंवर राजपूत संत थे, जिन्हें हिंदू भगवान श्रीकृष्ण का अवतार मानते हैं और मुस्लिम रामसा पीर के रूप में पूजते हैं।

रामदेवरा को रुणिचा धाम के नाम से भी जाना जाता है।

बाबा रामदेव जी का मंदिर प्रतिदिन सुबह 5 बजे खुल जाता हैं और रात्री में 9 बजे मंगल (बंद) होता हैं । 
हालांकि, भादवा मेले के दौरान यह समय बदल जाता हैं। मेले के दौरान मंदिर सुबह 3 बजे ही खुल जाता हैं एवं रात्री के 12 बजे तक खुला रहता हैं।